Thursday, 4 September 2014

गणेंश चतुर्थी के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई

गणेंश चतुर्थी के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई



बुद्धिदाता, विघ्नहर्ता भगवान गणेश के हर एक नाम में अपने भक्तों का उद्धार छुपा हुआ है। शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस में श्री गणेश को ओमकार: (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है। गौरीसुत, महागणपति सारे ब्रह्मांड के भगवान हैं।सभी शुभ कार्य के देव प्रथमेश्वर सफलता के स्वामी हैं। देवों के देव वक्रतुण्ड ज्ञान के दाता हैं। बाधाओं को हरने वाले, सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले सिद्दिविनायक को कोटी-कोटी प्रणाम  है।
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क्षमा की शक्ति

क्षमा की शक्ति


हम सब सामाजिक प्राणी हैं, जहाँ संबंधो की दुनिया में कुछ बुरा-भला आचरण स्वाभाविक है क्योंकि गलती करना मानव स्वभाव है। जिस प्रकार प्रकृति की बगिया में भाँति-भाँति के पुष्प और पौधे हैं उसी प्रकार जीवन की बगिया भी अनेक प्रकार की सोच और प्रकृति वाले लोगों से सुसज्जित है। कई बार हममें से कई लोगों का सामना नागफनी जैसे लोगों से भी होता है। वो अपनी सोच के अनुसार हमारा मुल्याकंन करते हैं जिससे हम विचलित हो जाते हैं। कहने वाला तो कह कर चला जाता है किन्तु हम हैं कि उसकी बात को दिल से लगा कर स्वयं को तकलीफ देते रहते हैं। ये जरूरी तो नही कि सबका नजरिया एक जैसा हो। हमें अपने पर विश्वास होना चाहिए तथा स्वयं को तकलीफ देने के बजाय उसे क्षमा करके उस बात को भूल जाना चाहिए।
ये भी सच है कि माफी या क्षमा भूलने के समान नही है तथा व्यक्ति कुछ चीजें कभी नही भूलता खासतौर पर जब मन पर या स्वाभिमान पर चोट लगी हो। परन्तु ये भी सच है कि गलती किससे नही होती अक्सर कहा जाता है कि गलती करना मानव स्वभाव है और क्षमा करना ईश्वरीय। किसी को क्षमा कर देने से उससे मिले कष्ट को भूलने में मदद मिलती है। जीवन तो बढने का नाम है ऐसे में यदि हम एक बात को लेकर बैठ जायेंगे तो आगे कैसे बढेगें। माफी तो एक ऐसी औषधी है जो गहराई तक जाकर घावों का इलाज करती है। ये उस जहर को खत्म कर देती है जो प्रेम तथा सोहार्द के लिए घातक है। माफी ऐसी प्रक्रिया है जिससे अपराधी से अधिक पीङित को राहत मिलती है। क्षमा कर देने वाला व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सेहत का हकदार होता है। जीवन में सुखमय शान्ति के दो ही तरीके हैं-
1- माफ कर दो उन्हे जिन्हे तुम भूल नही सकते।
2- भूल जाओ उनको जिन्हे तुम माफ नही कर सकते।
चिकित्सकों के अनुसारः- “जो लोग बदले की बजाय माफी में विश्वास रखते हैं वो आवेश तथा बदले की कल्पनाओं से मुक्त अच्छी नींद लेते हैं।“ क्रोध तो गर्म कोयले के समान है जिसे पकङ कर हम स्वयं को ही जलाते हैं। क्षमा करके हम स्व-परिचय, विशिष्टता और वासत्विक स्व को सुरक्षित रखते हैं। समाज के लिए ही नही बल्कि आपसी रिश्ते में भी क्षमा महत्वपूर्ण आधार है जो रिश्तों की नींव को मजबूत करती है। दूसरों के लिए क्षमा भाव के साथ खुद को भी माफ करना आवश्यक पहलु है। जब हम अपनी असफलताओं और गलतियों को मान लेते हैं तो ग्लानी भाव के बोझ से निकलकर सकारात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं तथा अपने आप से प्रेम करने लगते हैं जिससे जीवन का सफर सुखद हो जाता है।
क्षमा ऐसा मंत्र है जिसका बीज बचपन से ही बोने का काम करना चाहिए क्योंकि परिवार ही वह पहला स्कूल है जहाँ इसकी शिक्षा दी जा सकती है। जब माता पिता एक दूसरे को माफ करते हैं तो वो बच्चों को भी वास्तविक जीवन में क्षमा के महत्व समझाते हैं, यकिनन यही बच्चा आगे चलकर परिवार, समुदाय, समाज और राष्ट्र में इन मूल्यों को और एकता को बनाये रखने में सफल होता है।
हमारे सभी धर्मों में क्षमा को विषेश स्थान दिया गया है। ईद हो या होली, सभी लोग गले मिलकर एक दूसरे की गलतियों को माफ कर देते हैं और स्वस्थ भाई-चारे को बढावा देते हैं। जैन धर्म मानने वाले हर वर्ष सितंबर के महिने में एक विशेष पर्व मनाते हैं, जिसे क्षमा पर्व कहते हैं। सभी जन एक दूसरे से जाने अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रर्थना करते हैं। निःसंदेह ये सकारात्मक प्रक्रिया है जो मानवीय संबंधो में मधुरता का संचार करती है। शास्त्रों के अनुसारः-
 क्षमावशीकृतिलोर्के क्षमया किं न साध्यते।
शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः।।
अर्थात- संसार को क्षमा वश में कर लेती है। ऐसा कौन सा कार्य है जो क्षमा से नही हो सकता जिसके हाँथ में शान्ति रूपी तलवार हो दुर्जन उसका क्या बिगाङ सकता है।
ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि क्षमा पर्व जैसे सत्कर्म अगर केवल एक दिन या एक सप्ताह के लिए भी हों तो व्यक्ति का ह्रदय अपने अपराध भाव के बोझ से थोङा बहुत मुक्त हो जायेगा लेकिन यदि हम क्षमा भाव को अपनी जीवन शैली बना लें तो हम गुलाब की तरह वातावरण को खुशनुमा बना सकते हैं, जिसका काँटो के साथ रहते हुए भी महत्वपूर्ण स्थान है। माफी तो वह खुशबू है, जो एक फूल उन्ही हाँथो में छोङ जाता है, जिन हाँथो ने उसे तोङा होता है।   

आत्मनिर्भरता

आत्मनिर्भरता


आज की हाई प्रोफाइल और प्रतिस्पर्धा से भरी जीवन शैली में हम अपने बच्चों को सुपर किड देखना चाहते हैं। उसे शैक्षणिकं योग्यता के साथ-साथ अन्य विधाएं जैसे- नृत्य, गीत हो या तैराकी, घुङसवारी में भी योग्य बनाने का प्रयास करते हैं। ये सच है कि व्यक्तित्व को निखारने में शैक्षणिंक योग्यता के साथ इन शिक्षाओं का भी विशेष स्थान है। परंतु वास्तविकता में हम इस जद्दोजहद में एक महत्वपूर्ण शिक्षा को अनदेखा कर देते हैं। बच्चों को बचपन से उसकी जिम्मेदारियों से अवगत नही कराते। आलम ये है कि, सुबह उठाने से लेकर स्कूल के गृहकार्य तक लगभग सारे कार्य हम अभिभावक करते हैं। उम्र के अनुसार यदि बच्चों को उनकी जिम्मेदारियों का भी बोध कराएं तो निःसंदेह बङे होकर यही बच्चे समय प्रबंधन तथा आत्मनिर्भरता को समझ सकते हैं। परिवार तथा समाज के जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं, जो संपन्न राष्ट्र की महत्वपूर्ण ईकाइ है।

जिम्मेदारियों और फायदों के बीच सीधा संबंध होता है। घर के अन्य सदस्यों के समान ही छोटे-बङे कामों में बच्चों को शामिल करने से उनकी आत्मनिर्भता की बुनियाद मजबूत होती है। वही इमारत मजबूत होती है जिसकी नींव मजबूत होती है, उसी प्रकार बच्चे की बुनियाद आत्मनिर्भरता के सबक से बनाई जाए तो उसे कभी भी, किसी भी परिस्थिति में किसी के सहारे की जरूरत नही पङेगी। विषणु शर्मा द्वारा रचित पुस्तक पंचतंत्र में भी ये समझाया गया है कि राजा-महाराजाओं के बच्चों को भी बचपन से गुरुकुल में भेज दिया जाता था। जहाँ वे सुख-सुविधाओं से दूर पूर्णतः आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा ग्रहण करते थे। 
 
पौधों में पानी देना, पालतु जानवर को खाना देना जैसा कार्य 7 साल के बच्चे से कराया जा सकता है। इससे उनमें प्रकृति को भी समझने की इच्छा होगी। पशु-पक्षी सभी अपने बच्चों को बहुत जल्द आत्मनिर्भर बनना सिखाते हैं। केवल इंसान ही अपने बच्चे को कुछ ज्यादा ही बच्चा समझता है और एक दिन युवा हुए बच्चे से ऐसी उम्मीद लगाता है कि वो सारी जिम्मेदारियाँ, आत्मनिर्भरता के साथ बहुत अच्छे से निभाए ये कैसे संभव हो सकता है। कमजोर लता जो दुसरों के सहारे बढती हैं वो कभी वृक्ष नही बन सकती। यदि व्यक्ति हर काम में दूसरे की मदद लेता है तो फिर उसे सदा दूसरों पर ही निर्भर रहने की आदत पड़ जाती है। यह आदत आगे चलकर कष्ट ही देती है। आत्मनिर्भरता से आत्मविश्वास उपजता है जो प्रत्येक कार्य को करने व उसमें सफल होने की प्रेरक शक्ति है। अत: दूसरों पर निर्भर रहने की बजाय अपने काम स्वयं करें।
 
विनोबा भावे आत्मनिर्भता के महत्व को समझते थे इसीलिए सर्वोदय आंदोलन में अन्य बातों के अलावा आत्मनिर्भर गांवों की कल्पना भी शामिल किए थे।  दिसंबर 1949 में हैदराबाद से वापस आने के बाद विनोबा जी ने पवनार आश्रम में इसका प्रयोग प्रारंभ किया था। उन्होंने बिना बैलों के आश्रम में खेती की और सब्जी बोई। सिंचाई के लिए पानी निकालना बड़ा कठिन कार्य था। रहट में एक डंडे के स्थान पर आठ डंडे लगाए गए जिसके फलस्वरूप एक घंटे में सात सौ चक्कर लगे, जबकि पहले केवल 25चक्कर लगते थे। इस प्रकार थोड़े परिश्रम से भरपूर पानी मिला और देखते ही देखते समस्त भूमि हरी-भरी हो गई। ईंट पत्थर निकालने के बाद 125मन सब्जी पैदा हुई। हाथों से की जाने वाली खेती को विनोबा जी ने ऋषि खेती का नाम दिया था। पानी की कमी को पूरा करने के लिए पांच-छ महीनों में खुदाई करके एक कुआं तैयार कर लिया गया। एक साल में ही खेती से 135 किलो ज्वार, 4 क्विंटल मूंगफली और 6 क्विंटल अरहर दाल पैदा हुई। आश्रमवासी अपने वस्त्र भी हाथ से कते सूत के ही पहना करते थे। इस प्रकार आश्रमवासी विनोबा जी के मार्गदर्शन में पूर्णरूप से आत्मनिर्भर हो गए। उसके बाद अनेक गांवों ने उनका अनुकरण किया। 

कहने का आशय है कि, बचपन से लेकर किशोरावस्था और युवावस्था तक विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए जब बच्चा सही अर्थो में जिम्मेदार बनता है, तो वो वास्तविक सुपरकिड बनता है। उसके यही प्रयास, अनुभव और आपसी जिम्मेदारियां उसे एक सफल इंसान बनाते हैं। वो अपने बल पर अपने लक्ष्य को पाने में कामयाब होता है।  

प्रशंसा के फूल

प्रशंसा के फूल


याद कीजिए जीवन के वो स्वर्णिम पल जब शिक्षक और अभिभावक अच्छी पढाई, उत्कृष्ट खेल प्रदर्शन या अच्छे व्यवहार के लिए शाबासी देते थे और ‘Keep it up’ कहकर हौसला बढाते थे। ये शब्द बाल सुलभ मन में उत्साह का संचार कर देते थे। कार्य को और बेहतर करने की प्रेरणा देते थे। आज भले ही हम बङे हो गयें हों फिर भी अच्छे कार्यों के हेतु, अपनो से मिली प्रशंसा जीवन में नई चेतना और सकारात्मक ऊर्जा देती है। प्रशंसा से भरे शब्द संघर्षमय जीवन में रामबांण औषधी की तरह हैं। सच्ची तारीफ सदा लाभदायक होती है। व्यक्ति में प्रशंसा के माध्यम से उसके कार्य करने की क्षमता कई गुना बढ जाती है।   

प्रशंसा का भाव एक ऐसी औषधी है, जिससे व्यक्ति के मन में उमंग तथा उत्साह का संचार होता है। प्रशंसा राह भ्रमित व्यक्ति को राह पर ले आती है, उसमें सकारात्मक भावनाओं का विकास होता है। सच्ची प्रशंसा करने से कभी पीछे नही हटना चाहिए।  कभी भी झूठी तारीफ नहीं करनी चाहिए क्योंकि झूठी प्रशंसा चाटूकारिता या कहें चापलूसी का प्रतीक है। संभवतः इससे दूर ही रहना चाहिए।  

प्रशंसा करना एक कला है, जो दिल की गहराइंयों से निकलनी चाहिए, तभी उसकी पहुँच दूसरे तक जायेगी । कभी भी किसी की प्रशंसा करते समय आडंबर का सहारा नही लेना चाहिए। जीवन में हमसभी की कई बार ऐसे लोगों से मुलाकात होती है जिन्हे हम व्यक्तिगत रूप से नही जानते फिर भी उनके कार्यो से प्रभावित होते हैं। यदि जीवन में ऐसा ही कोई व्यक्ति नेक काम करते दिखे या अपने कार्य को ईमानदारी से निभाते दिखे तो उसकी प्रशंसा करने से स्वंय को कभी भी रोकना नही चाहिए। प्रशंसा के शब्द अमृत के समान हैं जिसको व्यवहार में अपनाने से दोनो को ही शांति और प्रसन्नता की अनुभूति होती है, जो बहुमूल्य है।

जीवन की यात्रा के दौरान यदि व्यक्ति को प्रशंसा मिलती है तो उसका अपने कार्य के प्रति उत्साह बढ जाता है और वे अधिक ऊर्जा से अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। अधिनस्त कर्मचारियों द्वारा किये गये उत्कृष्ट कार्यों पर बङे अधिकारियों द्वारा की गई प्रशंसा विकास की राह को आसान बनाती है। सामाजिक विकास हो या व्यक्तिगत विकास सभी एक दूसरे के सहयोग से सम्पूर्ण होते हैं, परन्तु आलम ये है कि हम उन सहयोग को भूल जाते हैं। विकास की दौङ में अप्रत्यक्ष लोगों की सराहना को नजर अंदाज कर देते हैं। जबकी प्रशंसा भरे शब्द तो सुगन्धित फूल के समान हैं जिसकी खुशबू व्यक्ति में अच्छे भावों को महका देती है।

सच्ची तारीफ अंधकार भरे जीवन में आगे बढने की चाह रूपी उजाले की ज्योति होती है। परंतु अपनी तारीफ स्वंय नही करनी चाहिए और दूसरों से मिली तारीफों से स्वंय में अंहकार को जगह नही देना चाहिए। प्रशंसा तो उस सीढी के समान है, जो हमें ऊपर भी ले जा सकती है और नीचे भी गिरा सकती है। किन्तु जीवन में कुछ पल ऐसे भी होते हैं जब स्वंय की पीठ भी थपथपा लेनी चाहिए और अपनी उपलब्धियों के बारे में सोचना चाहिए ताकि जीवन में आए निराशा के बादल स्व प्रेरणा से छँट जायें। स्व-सराहना जीवन में नई ऊर्जा के साथ कार्य करने की प्रेरणा देती है।

सच्ची प्रशंसा सदैव सकारात्मक भावों का ही विकास करती है। प्रशंसा के सदुपयोग से व्यक्ति का सकारात्मक और समुचित विकास होता है, परन्तु दुरपयोग से अंहकार एवं द्वंद का जन्म होता है। इसलिए प्रशंसा रूपी मिठास का सही समय पर, सही तरीके से उपयोग करना चाहिए और प्रशंसा करने का अवसर चूकना नही चाहीए। 

               
 

मानवता का प्रतीक है, सहयोग की भावना

मानवता का प्रतीक है, सहयोग की भावना



मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जिसकी उन्नति सहयोग की बुनियाद पर निर्भर है। जिस प्रकार ईंट से ईंट जोङकर विशाल भवन बनता है, पानी की एक-एक बूंद से सागर बनता है। उसी प्रकार अनेक व्यक्तियों के परस्पर सहयोग से ही मनुष्य का विकास संभव है। समाज और राष्ट्र की समृद्धि परस्पर सहयोग पर ही निर्भर है।

पूर्ण विकास सहयोग से ही होता है। कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नही होता। कलाकार के सामने डॉक्टर अयोग्य है, तो डॉक्टर के सामने इंजीनियर, तो कहीं साहित्यकार के सामने व्यपारी। कहने का आशय ये है कि, सभी अपनी-अपनी विधाओं में पूर्ण हैं किन्तु संतुलित विकास के लिए एक दुसरे का सहयोग अति आवश्यक है। सहयोग की आदतें मनुष्य में मैत्री भावना का विकास करती हैं। गौतम, महावीर, ईसा हों या कृष्ण, कबीर, राम, रहीम सभी महापुरुषों में मैत्री की भावना समान है।

धरती पर जैविक संरचना कुछ इस प्रकार है कि समाज से परे अकेले व्यक्ति का विकास संभव नही है। प्राणी में शरीर के सभी अंग मिलकर कर कार्य करते हैं तभी व्यक्ति अनेक कार्य करने में सक्षम होता है। इतिहास गवाह है कि रावण, कंस, दुर्योधन हो या हिटलर, मुसोलिन, चँगेज खाँ तथा नादिरशाह जैसे शक्तिसंपन्न कुशल नितिज्ञ थे किन्तु सभी ने सामाजिक भावना का निरादर किया जिसका परिणाम है उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
  
सृजन का आइना है परस्पर सहयोग। जिस तरह आम के वृक्ष का विशाल अस्तित्व, मधुर फल, शीतल छाया दूसरें लोगों के सहयोग का ही परिणाम है। उसी प्रकार व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व समाज के प्रयत्नों का ही फल है।
मदर टेरेसा का कहना था कि, “आप सौ लोगों की सहायता नही कर सकते तो सिर्फ एक की ही सहायता कर दें।“ 

सच ही तो है मित्रों, एक और एक ग्यारह होता है, बूंद-बूंद से ही घङा भरता है। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी पर निर्भर है कि लोग व्यक्तिवाद की मानसिकता को छोङकर सहयोग के महत्व को समझते हुए उसे जीवन का अहम हिस्सा बना ले। सहयोग की भावना की एक शुरुवात से ही "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना सजीव होती है।

आधुनिक समाज में नारी का अस्तित्व

आधुनिक समाज में नारी का अस्तित्व



आम बोलचाल की भाषा में  ‘लेडिज फर्स्ट’ एक ऐसा कथन है, जो नारी के लिए सम्मान स्वरूप है। इतिहास साक्षी है, सिन्धुघाटी की सभ्यता हो या पौराणिंक कथाएं हर जगह नारी को श्रेष्ठ कहा गया है।
"यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता" वाले भारत देश में आज नारी ने अपनी योग्यता के आधार पर अपनी श्रेष्ठता का परिचय हर क्षेत्र में अंकित किया है। आधुनिक तकनिकों को अपनाते हुए जमीं से आसमान तक का सफर कुशलता से पूरा करने में सलंग्न है। फिर भी मन में ये सवाल उठता है कि क्या वाकई नारी को 'लेडीज फर्स्ट' का सम्मान यर्थात में चरितार्थ है या महज औपचारिकता है। अक्सर उन्हे भ्रूणहत्या और दहेज जैसी विषाक्त मानसिकता का शिकार होना पङता है। नारी की बढती प्रगति को भी यदा-कदा पुरूष के खोखले अंह का कोप-भाजन बनना पङता है।

आज की नारी शिक्षित और आत्मनिर्भर है। प्रेमचन्द युग में नारी के प्रति नई चेतना का उदय हुआ। अनेक शताब्दियों के पश्चात राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने नारी का अमुल्य महत्व पहचाना और प्रसाद जी ने उसे मातृशक्ति के आसन पर आसीन किया जो उसका प्राकृतिक अधिकार था। आजादी के बाद से नारी के हित में कई कानून बनाये गये। नारी को लाभान्वित करने के लिए नित नई योजनाओं का आगाज भी हो रहा है। बजट 2013-14 में तो महिलाओं के लिए ऐसे बैंक की नीव रखी गई जहाँ सभी कार्यकर्ता महिलाएं हैं। उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कठोर से कठोर कानून भी बनाये गये हैं। इसके बावजूद समाज के कुछ हिस्से को दंड का भी खौफ नही है और नारी की पहचान को कुंठित मानसिकता का ग्रहंण लग जाता है। "नारी तुम श्रद्धा हो" वाले देश में उसका अस्तित्व तार-तार हो जाता है। 
  
आधुनिकता की दुहाई देने वाली व्यवस्था में फिल्म हो या प्रचार उसे केवल उपभोग की वस्तु बना दिया गया है। लेडीज फर्स्ट जैसा आदर सूचक शब्द वास्तविकता में तभी सत्य सिद्ध होगा जब सब अपनी सोच को सकारात्मक बनाएंगे। आधुनिकता की इस अंधी दौङ में नारी को भी अबला नही सबला बनकर इतना सशक्त बनना है कि बाजारवाद का खुलापन उसका उपयोग न कर सके। नारी को भी अपनी शालीनता की रक्षा स्वयं करनी चाहिए तभी समाज में नारी की गरिमा को सम्पूर्णता मिलेगी और स्वामी विवेकानंद जी के विचार साकार होंगे।
विवेकानंद जी ने कहा था कि- "जब तक स्त्रियों की दशा सुधारी नही जायेगी तब तक संसार में समृद्धी की कोई संभावना नही है। पंक्षी एक पंख से कभी नही उङ पाता।"

इस उम्मीद के साथ कलम को विराम देते हैं कि, आने वाला पल नारी के लिए निर्भय और स्वछन्द वातावरण का निर्माण करेगा, जहाँ आधुनिकाता के परिवेश में वैचारिक समानता होगी। नारी के प्रति सोच में सम्मान होगा और सुमित्रानन्दन पंत की पंक्तियाँ साकार होंगी—
मुक्त करो नारी को मानव, चिर वन्दिनी नारी को।
युग-युग की निर्मम कारा से, जननी सखि प्यारी को।।     

Strong Will Power( दृण इच्छाशक्ति)

Strong Will Power( दृण इच्छाशक्ति)


वर्तमान का समय प्रतियोगिता का समय है। आज हर कोई एक दूसरे से आगे बढना चाहता है। आगे बढने की प्रवृत्ति विकास के राह को आसान करती है। विद्यार्थी हो या व्यपारी, शोध-कर्ता हो या किसान हर कोई अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रर्दशन करना चाहता है। परन्तु कुछ लोग अपनी इच्छा के अनुरूप परिणाम को प्राप्त कर लेते हैं, तो कुछ लोग चाहत के अनुसार अपने लक्ष्य को हासिल नही कर पाते। जो अपने कार्य को दृण इच्छा शक्ति से पूर्ण करता है वो लक्ष्य को निःसंदेह हासिल करता है। नेपोलियन बोनापार्ट का कहना था कि, असम्भव शब्द मेरे शब्दकोश में नही है। लाल बहादुर शास्त्री, गाँधी जी, सुभाष चन्द्र बोस, अब्राहम लिंकन, आइंस्टाइन, सरदार पटेल, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इत्यादि बङे-बङे महापुरूष अपनी दृण इच्छा शक्ति से ही उच्चतम शिखर पर पहुँचे और आज भी सभी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
कहने का आशय ये है कि यदि मनुष्य चाहे तो सब कुछ सम्भव है। उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कार्य को ईमानदारी से और दृण संकल्प के साथ करना चाहिए। मजबूत इच्छा विपरीत परिस्थीति में भी आगे बढने की प्रेरणा देती है। मनुष्य का मन बहुत चंचल होता है, नित नई इच्छाएं जन्म लेती रहती हैं।अतः मन की चंचलता को नियन्त्रित करने के लिए इच्छा शक्ति की दृणता अनिवार्य होती है। गीता में कहा गया है कि, “मन को वश में करना कठिन जरूर है पर असम्भव नही है।“
दृण इच्छा शक्ति के बल पर ही तेनसिहं और बछेन्द्री पाल जैसे पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट पर विजय पताका फहराई। इंग्लिश चैनल और उत्तरी ध्रुव के बर्फिले सागर को दृण इच्छा शक्ति के बल पर ही पार किया गया। लक्ष्य के प्रति दृण इच्छा रखने वाले संकल्पवान लोग इतिहास की धारा बदल देते हैं।

सफलता के लिए दृण संकल्प का होना आवशयक है किन्तु आज आगे बढना तो हर कोई चाहता है परन्तु विषम परिस्थिती में संघर्ष करना नही चाहता। परिश्रम करने से भागता है और शार्टकट तरीके से सबकुछ पाना चाहता है। लक्ष्य के प्रति दृण इच्छाशक्ति का अभाव इंसान की सबसे बङी कमजोरी है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, “गहरी इच्छा हर उपलब्धि का शुरूवाती बिन्दु होती है, जिस तरह आग की छोटी लपटें अधिक गर्मी नही दे सकती वैसे ही कमजोर इच्छा बङे नतीजे नही दे सकती।“ मजबूत इरादों से ही लक्ष्य की राह आसान होती है।

गाँधी जी ने कहा था कि, “Strength Dose not come from Physical  capacity. It comes from an Indomitable  will.”

अपनी दृण इच्छाशक्ति और अटूट विश्वास के बल पर भारत की पहली महिला आई. पी. एस. अधिकारी किरण बेदी ने अनेकों कठिनाईयों के बावजूद अपने लछ्य को हासिल किया। एशिया का सबसे बङा ‘मेग्सस पुरस्कार’ प्राप्त कर भारत को भी गौरवान्वित किया। अनेक लोगों की प्रेरणा स्रोत किरण बेदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में पुलिस सलाहाकार नियुक्त किया गया। (Strong will power )दृण इच्छा शक्ति से कैंसर जैसी जानलेवा बिमारी से भी जीता जा सकता है। यदि इरादे मजबूत होते हैं तो उम्र की सीमा और विकलांगता भी बाधा नही बनती। प्रेमलता अग्रवाल 48 वर्ष की उम्र में एवरेस्ट पर फतह हासिल करने वाली सबसे अधिक उम्र की पहली महिला हैं। हेलेन केलर की दृण इच्छा शक्ति के आगे उनकी दृष्टीबाधिता नत्मस्तक हो गई।  

स्वामी विवेकानंद जी का कहना था कि, “पवित्र और दृण इच्छा सर्वशक्तिमान है, अतः प्रबल इच्छा को कठिन अभ्यास एवं संकल्प शक्ति द्वारा प्राप्त करना चाहिए।“

सफलता की कामना करना उत्तम विचार है। उसकी पूर्णता के लिए कार्य के आरंभ में ही दृण इच्छा को अपने में समाहित कर लेना चाहिए। ईमानदारी के साथ कार्य पूर्ण करने में अपनी सारी  शक्ति लगा देनी चाहिए। दृण इच्छाशक्ति मार्ग की बाधाओं को पार कर देती है और सफलता के शिखर पर पहुँचना आसान कर देती है। अतः अपनी सोच को साकार रूप देने के लिए दृण इच्छा शक्ति (Strong Will Power) को रग-रग में संचारित कर लें।

"कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नही मन चाहिए, साधन सभी जुट जाएंगे, संकल्प का धन चाहिए, गहन संकल्प से ही संभव है पूर्ण सफलता।"

बदलता बचपन जिम्मेदार कौन????

बदलता बचपन जिम्मेदार कौन????








बचपन की बात करते ही एक ऐसा चेहरा नजर आता है जिसमें मस्ति, खुशी, बेफ्रिक और मासूमियत झलकती थी, जिसे देखकर उनकी भूलों को माफ कर दिया जाता था, किन्तु आज के परिपेक्ष में देखें तो, परिपक्व अपराधों से, कम उम्र के बच्चे इस तरह जुङे हैं कि उनकी मासुमियत नजर ही नही आती। 

आज देश में एक बङी बहस चल रही है कि नाबालिग बच्चे अपराध की तरफ क्यों बढ रहे हैं। निर्भया काण्ड हो या हाल ही में दिल्ली में एक ज्वेलर के घर में हुआ अपराध। हत्या जैसा जघन्य अपराध करने में भी आज 14-15 साल के बच्चे हिचकते नही। कहाँ गया वो मासूम बचपन ??
आर्थिक सामाजिक स्थितियों के कारण सङक पर रह रहे लावारिस बच्चे अशिक्षा एवं उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपराधी प्रवृत्तियों के चंगुल में फंस जाते हैं। गरीबी और भूखमरी उन्हे अपराध की दुनिया का रास्ता दिखाती है। परन्तु आज स्थिती इतनी भयानक हो गई है कि शिक्षित और सभ्य कहे परिवारों के बच्चों के लिए अपराध खेल बन गया है और वे अपराधिक प्रवृत्ति के नशे में मस्त हैं। भ्रष्टव्यवस्था के कारण रसूखदारों के बच्चों को सजा का भी खौफ नही है। कई बार अभिभावकों द्वारा छोटी-छोटी गलतियाँ नजर अंदाज कर दी जाती है, यही छोटी-छोटी गलतियाँ सूरसा के मुहँ की तरह बङी हो जाती है और अभिभावकों को पछतावे के सिवाय कछ भी हाँथ नही लगता।

बच्चे हर जमाने में समझदार और चुलबुले होते हैं। आज के बच्चे ज्यादा स्टाइलिश, गुगल अपडेटेड हैं। उनके मन में वर्चुअलदुनिया बसती है। तकनिकी समझदारी का आलम ये है कि 4 से 10 साल के बच्चों के लिए मोबाइल, आईपेड और टेबलेट खिलौना बन गये हैं। गलियों में धमाल मचाने वाला नटखट बचपन, लुका-छिपी, ऊँच-नीच, हरा समंदर नीली तितली वाले खेलों को विडियो गेम का ग्रहंण लग गया है। गेम भी इस प्रकार के कि एक व्यक्ति मशीन गन से लोगों मारते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। जहाँ बचपन तकनिकी के पंख लगाकर उङ रहा है, 14-17 साल के बच्चे ऐसे कई अपराधों में लिप्त पाये गये हैं जो बालिग मानसिकता को परिलाक्षित करता है। वहाँ हमारा कानून अभी भी पुरानी मासुमियत भरे बचपन के भ्रम में ही है। कम उम्र में बढती परिपक्वता कई चिन्ताओं को जन्म दे रही है।  

प्रश्न ये उठता है कि बचपन की इस बदलती और बदरंग होती तस्वीर क्या सिर्फ बच्चों द्वारा ही बनाई जा रही??? मेरा मानना है कि, बच्चो की इस बदलती दुनिया के लिए हमारी सामाजिक, आर्थिक और पूंजीवादी व्यवस्था बहुत हद तक जिम्मेदार है।
पूंजीवाद ने लिटिल वंडर को स्मार्ट उपभोक्ता में बदल दिया है। मॉल संस्कृति के ये बच्चे मेले की भीङ-भाङ से घबराते हैं। उनके लिए गंगा की घाट पर नहाना अनहाइजेनिक है और वाटरकिंगडम में नहाना प्रतिष्ठा का सूचक है। पिज्जा, बरगर को खाते हुए देशी समोसे और कचोरी को सोSSS ऑयली कह कर छोङ देते हैं।   
बच्चों का रूठना, फरमाइश करना पहले भी होता था, तब बच्चों को मनाने का तरिका दूसरा हुआ करता था। बच्चों को अच्छी शिक्षाप्रद कहानी सुनाकर या घर में कुछ स्पेशल खाने की चीज बनाकर उन्हे मनाते थे इसी में प्यार और अपनापन होता था। आज हम अभिभावक बच्चे को बहलाने के लिए सेलफोन थमा देते हैं। भाई-बहन के झगङे को निपटाने की बजाय उन्हे अलग-अलग करके एक को टीवी के आगे बैठा देते हैं और दूसरे के हाँथ में लेपटॉप थमा देते हैं। प्रतिस्पर्धा वाले बाजारवाद में चैनल की दुनिया पर क्या विश्वास किया जा सकता है?गिरते नैतिक स्तर का असर आज के टीवी कार्यक्रमों में देखा जा सकता है किन्तु, माता-पिता को इससे कोई सरोकार नही कि बच्चा क्या देख रहा है या किस तरह की भाषा सुन रहा है। बाल- मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे परिवेश का असर बच्चे पर अत्यधिक पङता है। बच्चे काल्पनिक दुनिया में जीते हैं। उसमें आधुनिकता की दुहाई देने वाले पाश्चातय संस्कृति में रंगे कार्यक्रमआग में घी का काम करते हैं।

स्वामी विवेकानंद जी का कथन हैः- “बच्चों पर निवेश करने की सबसे अच्छी चीज है अपना समय और अच्छे संस्कार। ध्यान रखें, एक श्रेष्ठ बालक का निर्माण सौ विद्यालयों को बनाने से बेहतर है।“

आज का बचपन पहले से मुखर और होशियार है। पहले परिवार बच्चों का मूल आधार होते थे। आज की अत्यआधुनिक एवं अपार्टमेंट लाइफ में बच्चों के मन को सींचने और पोषित करने का वक्त माता-पिता के पास नही है। दादा-दादी एंव नाना-नानी की जगह रिक्त है। सब मिलकर न चाहते हुए भी हम सब ने बच्चों की सुहानी दुनिया में काँटे बो दिये हैं। पहले खेल-खेल में एक्सरसाइज हो जाती थी और बच्चों में मिलजुलकर रहने की प्रवृत्ति का विकास होता था। आज एकल खेल बच्चों में अंर्तमुखी भावना को जागृत कर रहे हैं जिससे मासूम बच्चे अवसाद में आत्महत्या तक को अंजाम दे रहे हैं।

नेहरु जी का कथन हैः- “Children are likes buds in a garden and should be carefully and lovingly nurtured, as they are the future of the Nation and citizens tomorrow.”

सहजता बचपन का मूलर्धम है। यह वो भाव है जो बीज से पेङ बनकर समर्थ और मानवीय गुणों से युक्त व्यक्ति का निर्माण करता है। बचपन तो उस कोरी किताब की तरह है जिसपर जो चाहो लिखा जा सकता है। कहते हैं इमारत वही मजबूत होती है जिसकी नींव मजबूत हो, यही नियम बच्चों के विकास पर भी लागू होता है। अच्छे संस्कारों से बनी बचपन की नींव सभ्य और सुसंस्कृति युवा का आधार है।

आज की दुनिया उनकी स्वयं की रचाई दुनिया नही है। ये दिशाहीन  दुनिया अनियमित सामाजिक, पारीवारिक, बाजारवादी और राजनैतिक प्रक्रियाओं की उपज है। आज डोरेमॉन, नोबिता, शिनचैन और स्पाइडर मैन देखकर बच्चे एंग्री बर्डस तो बन सकते हैं। परन्तु रविन्द्र नाथ की‘मिनी’ या ‘चेखव’ नही बन सकते।  

डॉ. कलाम का कहना है कि, “जब माता-पिता अपने बच्चे को विभिन्न चरणों में शक्तिशाली बनाते हैं, तो बच्चा जिम्मेदार नागरिक बनता है। जब एक शिक्षक को ज्ञान और अनुभव से शक्ति-संपन्न बनाया जाता है तो छात्र आगे चलकर योग्य युवा बनता है, जो राष्ट्र एवं परिवार के हित में कार्य करता है।“   

आज समय की माँग है कि, दोषारोपण करने की बजाय हम सब मिलकर हर बच्चे को उसका बचपन लौटाएं, मिलकर एक बेहतर कल बनायें।
“The Greatest gifts you can give your children are the roots of responsibility and the wings of Independence.”   


उच्च कोटी के वक्ता (अटल बिहारी वाजपेयी)

उच्च कोटी के वक्ता (अटल बिहारी वाजपेयी)



राष्ट्र के उच्चकोटी के वक्ता, जिनके लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है। “पद्मविभूषण” जैसी बङी उपाधी से अलंकृत अटल जी भारत के प्रधानमंत्री पद को दो बार सुशोभित कर चुके हैं। भारत में ही नही अपितु अन्य देशों में भी अनेक लोग उनकी ओजस्वी और तेजस्वी शैली में रची कविताओं और भाषणों के कायल हैं।

व्यंग्य विनोद की फुहारों के साथ उनके भाषण जन-जन में प्रिय हैं। अटल जी अपने भाषणों के माध्यम से जन-जन में देशप्रेम की अलख जगाने वाले राजनीतिज्ञ नही वरन् सच्चे देशभक्त कवि और साहित्यकार हैं। उनकी इंसानियत कवि मन की कायल है। नैतिकता के प्रतीक अटल जी के भाषण से संबन्धित कुछ प्रसंग आप सभी से सांझा(Share) कर रहे हैं।
अटल जी के अनुसार उन्होने अपना पहला भांषण पाँचवी कक्षा में आयोजित एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में बोला था। जहाँ अटक-अटक कर बोलने की वजह से उनकी बहुत हँसाई हुई थी। दरअसल तब वे अपना भाषंण रट कर गये थे। दृणसंक्लप अटल जी ने तभी ये निश्चय किया कि अब कभी भी रटकर भांषण नही बोलेगें। उनकी दृणसंक्लपता का ही परिणाम है कि उनके भाषणों को सुनने दूर-दूर से लोग आते हैं।

एक बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन था। अटल जी एवं रघुनाथ सिंह इस प्रतियोगिता में भाग लेने जा रहे थे। परन्तु ट्रेन लेट हो जाने की वजह से वो लोग, प्रतियोगिता समाप्त होने पर वहाँ पहुँचे। उस समय निर्णायक मंडल निर्णय तैयार कर रहे थे। परेशान हुए बिना अटल जी ने ट्रेन लेट होने की बात अध्यक्ष महोदय को बताई, महोदय ने उन्हे बोलने की इजाजत दे दी। अटल जी ने अपनी परिमार्जित और काव्यात्मक शैली में ऐसा उत्कृष्ट भाषण दिया कि उन्हे सर्वप्रथम वक्ता होने का पुरस्कार प्राप्त हुआ। उस निर्णायक मंडल में डॉ. हरिवंश बच्चन जी भी थे।

अटल जी की वाकपटुता का एक और प्रसंग है। “एक बार वाद-विवाद का विषय था, ‘हिन्दी राष्ट्रभाषा होनी चाहिए’। अटल जी पक्ष के वक्ता थे और उनका जोङीदार विपक्ष का जिसे हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी का पक्ष लेना था। परन्तु ऐन वक्त पर उनके जोङीदार ने कहा कि, अटल में तो पक्ष में बोलने की तैयारी करके आया हुँ। विचलित हुए बिना अटल जी ने कहा कोई बात नही, आप पक्ष में बोल दीजीए। अटल जी बिना किसी तैयारी के प्रतिपक्ष के विषय पर बोले। उनके आत्मविश्वास का आलम ये था कि वे उस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान से पुरस्कृत हुए।“

अपनी अद्भुत भाषा शैली से उन्होने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म,पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन करते हुए जन-मानस में देशभक्ती का शंखनाद किया। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, भाषा शैली पर उनकी मजबूत पकङ है। अपने विचारों को प्रभावशाली शब्दो में अभिव्यक्त करने की प्रतिभा के धनी अटल जी को उनके आने वाले जन्मदिन (25 दिसम्बर) पर अभिनंदन और वंदन करते हैं। ईश्वर से अटल जी की स्वस्थ दीर्घायु की कामना करते हैं।

Be Happy

Be Happy


आज की भागती दौङती जिदंगी में चन्द खुशियाँ पूरे वातावरण को खुशनुमा बना देती हैं। जीवन में खुशियाँ न हो तो जिंदगी निरस हो जाती है। कहते हैं बूंद बूंद से घङा भरता है उसी तरह छोटी छोटी खुशियाँ पूरे जीवन को सकारत्मक ऊर्जा से सराबोर कर देती हैं।
हम में से कई लोगों को लगता है कि खुशियाँ बाहरी चीजों से आती है जैसे- पैसा, सफलता, प्रसिद्धि आदी। दरअसल हम भ्रमित हो गये हैं कि सच्ची खुशी कहाँ और कैसे मिलेगी? खुशी एक ऐसा भाव है जिसके कई रूप हैं। शांती से लेकर उल्लास तक और आंनद से आध्यात्म तक। इसकी कोई सीमा नही होती। किसी को नई कार खरीदने पर तो किसी को प्रमोशन मिलने पर खुशी मिलती है। छोटे बच्चों को मनचाहा खिलौना मिलने पर खुशी। किसी को डूबती चींटी को बचाकर अर्थात दूसरों की सहायता करके खुशी मिलती है।
मदर टेरेसा ने कहा है कि- “The happiness of life is made up of little things- A Smile, A Hug, A Moment of shared laughter.”
जिस तरह हम खुशियों के लिये बाँहे फैलाते हैं, उसी तरह दुखों को भी स्वीकार करना चाहीये। खुशी और गम सिक्के के दो पहलु हैं। असल में हम दुख से भाग कर सुख को कभी नही पा सकते क्योंकि जब तक हम दुख को महसूस नही करेंगे तब तक खुशी के महत्व को नही समझ सकते।
किये गये शोध के अनुसार दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में पैसा बहुत बढा लेकिन लोगों में खुशी का स्तर उसके मुकाबले कम बढा। कहीं ये भी देखने को मिलता है कि भरपूर पैसा, शोहरत, विलासिता के सभी भौतिक साधन उपलब्ध होने के बावजूद भी लोग खुश नही रहते, कई बार तो आत्महत्या जैसा फैसला भी ले लेते हैं। अमीर देशों में भी लोग उतने ही दुखी हैं जितने गरीब देश में। गाँधी जी का कहना है कि-
“ख़ुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, वोसामंजस्य में हों।“
सच्ची खुशी एक ऐसी भावना है, जिसे खुद चुना जाता है। सच्ची खुशी एक व्यक्तिगत यात्रा है। उपनिषद में लिखा है कि जो कुछ भी अंनत है, वही असली खुशी है। मार्टिन सेलिगमेन ने अपनी किताब- ऑर्थेटिक हैप्पीनैस में लिखा है किः- खुशी सिर्फ जींस और किस्मत का खेल नही है, इसे हम अपने व्यवहार से हासिल करते हैं। 
इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति के अनुसार- “मुझे उस समय बहुत खुशी होती है जब मैं अपने आसपास के लोगों को मुस्कराते हुए देखता हूँ। यह ऐसी संपत्ति बांटने जैसा होता है, जिसकी कोई किमत नही होती।“

कुछ लोगों का मानना है कि खुशी के लिये अधिक आत्मविश्वास का होना बहुत जरूरी है किन्तु ये सर्वदा सत्य नही है क्योंकि कई बार अति आत्मविश्वास लोगों के मन में ये भावना ला देता है कि वह जीवन में बहुत कुछ कर सकते थे, लेकिन नही कर सके ये सोच उन्हे दुख में डुबो देती है।

शोध के अनुसार जिन लोगों का व्यवहार सकारात्मक एवं भावात्मक होता है वो सर्दी जुकाम से कम ग्रसित होते हैं। डॉ. कोहने के अनुसार- ऊर्जावान और खुशमिजाज रहने वाले व्यक्तियों की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है क्योंकि जब हम खुश रहते हैं तो दिमाग में ऐसा हार्मोन्स उत्पन्न होता है जो जुकाम से उत्पन्न रसायन को कंट्रोल करता है।

एक चीनी कहावत हैः- एक घंटे की खुशी के लिये – झपकी लें

एक दिन की खुशी के लिये – पिकनिक पर जाएं
एक महिने की खुशी के लिये – शादी कर लें

एक साल की खुशी के लिये – विरासत में संपत्ति पाएं

जिंदगी भर की खुशी के लिये – किसी अनजान व्यक्ति की मदद कीजीये। 
खुशियाँ केवल सुखों और अच्छी परिस्थितियों का आनंद उठाने से नही जुङी हैं, बल्कि वे हमारे हर मुश्किल वक्त की तीव्रता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई शोध से यह सिद्ध कर चुके हैं कि- खुश लोग ज्यादा सफल होते हैं। मजबूत रिश्तों का आंनद उठाते हैं एवं कम बीमार पङते हैं। उम्मीद को सदैव जिन्दा रखते हैं तथा बुरे अनुभव से जल्दी उबर जाते हैं।

मित्रों, खुश रहने के लिये किस्मत, पैसा, शक्ती या किसी भौतिक साधन की जरूरत नही होती क्योंकि खुशियां उसी तरह हमारे अंदर है जिस तरह आकाश हमारे बाहर। खुशी तो तितली की तरह है, जिसे पकङने की कोशिश की जाये तो वो दूर हो जाती है और जब हम शांत बैठ जाते हैं तो वह चुपचाप हमारे कंधे पर बैठ जाती है। मित्रों मेरी नजर में खुशी ये है कि-
“एक सद्कार्य द्वारा किसी एक को ख़ुशी देना, प्रार्थना में झुके हज़ार सिरों से बेहतर है।“

अनोखे विजेता

अनोखे विजेता


कई साल पहले सिएटल (अमेरिका) में विकलांगो के लिये विशेष औलंपिक खेल आयोजित किये गए। औलंपिक की 100 मीटर दौङ के मुकाबले में 9 प्रतियोगी शामिल हुए। सभी शारीरिक और मानसिक रूप से असहाय थे।

दौङ की घोषणा हुई। घावको ने जगह संभाली और रैफरी के बंदूक के इशारे पर ही धावक लक्ष्य की ओर दौङ पङे, लेकिन एक छोटा विकलांग लङका दौङने की बजाय अपनी जगह पर ही खङा-खङा रोने लगा। उसे समझ नही आ रहा था कि किधर और कैसे दौङना है। तभी आठो धावक लक्ष्य की ओर बढने की बजाय उल्टे उस जगह लौटने लगे जहाँ से दौङ शुरू किये थे। उनमें से एक ने आगे बढकर रोने वाले लङके को गले से लगाकर दिलासा दी। बाकी धावकों ने हाथ से हाथ पकङे और उस लङके को साथ लेकर फिर से लक्ष्य की ओर बढ चले। किन्तु इस बार कोई अकेला नही था, सब साथ-साथ दौङ रहे थे। उन्हे इस तरह देख सभी दर्शक खुशी से तालियाँ बजा रहे थे और उनके हौसले व समर्पण की दाद दे रहे थे।

अब उस दौङ का कोई एक नही, पूरे 9 विजेता थे और ये विजेता सिर्फ 100 मीटर की दौङ नही जीते थे, बल्की वे ऐसी दौङ जीते थे जो एक सामान्य आदमी कभी नही जीत सकता। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि-

“हमारा कर्तव्य है कि हम हर किसी को उसका उच्चतम आदर्श जीवन जीने केसंघर्ष में प्रोत्साहन करें: और साथ ही साथ उस आदर्श को सत्य के जितनानिकट हो सके लाने का प्रयास करें”

सच ही तो है मित्रों, हमें केवल सफल होने की कोशिश ही नही करनी चाहिये बल्की मूल्य आधारित जीवन को आत्मसात करके एक सफल एवं सभ्य इंसान बनने की कोशिश करनी चाहीये।

असत्य पर सत्य की जीत

असत्य पर सत्य की जीत


दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। इसका आयोजन अश्विन मास मेंशुक्ल पक्ष की दशमी को होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वधकिया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है।विजयादशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवाबुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी, बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने कादिन होता है। रावण में कुछ अवगुण जरुर थे, लेकिन उसमें कई गुण भीमौजूद थे, जिन्हे कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में उतार सकता है। यदिरामायण या राम के जीवन से रावण के चरित्र को निकाल दिया जाए तो संपूर्णरामकथा का अर्थ ही बदल जाएगा। स्वयं राम ने रावण के बुद्धि और बल कीप्रशंसा की है। रावण जब मृत्यु शैया पर था तब भगवान राम जी ने लक्ष्मण कोरावण के पास शिक्षा लेने के लिए भेजा था।

महर्षि वाल्मीकि ने रावण को ‘महात्मा’ कहा है। सुबह के समय लंका में पूजा-अर्चना, शंख और वेद ध्वनियों से गुंजायमान वातावरण का रामायण मेंअलौकिक चित्रण है। रावण अतुलित ज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का ज्ञाता था।एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति, वास्तुकला का ज्ञाता एवं राष्ट्रनायक था।

उसने माता सीता का हरण अवश्य किया था लेकिन इसके पीछे उसका विचारकितना उज्ज्वल था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है किउसने एक बार मंदोदरी से कहा था कि -

'
दसी पड़े तो पड़न दे मन में राखो धीर। 

ता कारण सीता हरी कि मुक्ति देत रघुवीर।' 

अर्थात 'मेरे दस के दस शीश भी कट जाएँ तो कटने दे, मन में थोड़ा धीरजरख। मैंने सीता का हरण इसलिए किया है कि मुझे रघुवीर के हाथों मुक्तिमिले।'

रावण में अवगुण की अपेक्षा गुण अधिक थे। रामकथा में रावण ऐसा पात्र है,जो राम के उज्ज्वल चरित्र को उभारने का काम करता है। संयमी रावण नेमाता सीता को अंतःपुर में नहीं रखा,बल्कि अशोक वन में सीता को स्त्री-रक्षकों की पहरेदारी में रखा ताकी राम का वनवास-प्रण खंडित न हो। रावण नेसीताजी द्वारा उपहास किए जाने के बावजूद भी बलप्रयोग कदापि नहीं किया,यह उसकी सहनशीलता और संयमशीलता को परिलाक्षित करता है।

 

असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देने वाले विजयादशमी पर्व पर जहां एकओर लाखों की संख्या में लोग भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं वहीं देश मेंकुछ लोग रावण को अपना आराध्य मानकर शक्ति के रूप में उसकी पूजाकरते हैं।

कानपुर में एक मंदिर जिसका नाम ‘दशानन मंदिर’ है। यहां श्रद्धालु सिर्फरावण की पूजा अर्चना ही नहीं करते बल्कि अपने लिये मन्नतें भी मांगते हैं।कानपुर से सटे उन्नाव जिले के मौरावां कस्बे में भी राजा चन्दन लाल द्वारासन् 1804 में स्थापित रावण की मूर्ति की पूजा की जाती है।

मध्य प्रदेश के मंदसौर में नामदेव वैश्य समाज के लोगों के अनुसार रावण कीपत्नी मंदोदरी मंदसौर की थी। अतः यहाँ रावण की वंदना करने व भोग लगानेकी परंपरा है।


मध्य प्रदेश के ही विदिशा जिले में स्थित रावणगाँव में रावण को महात्मा याबाबा के रूप में पूजा जाता है। यहाँ रावण बाबा की करीब आठ फीट लंबीपाषाण प्रतिमा लेटी हुयी मुद्रा में है और प्रति वर्ष दशहरे पर इसका विधिवतश्रृंगार करके अक्षत, रोली, हल्दी व फूलों से पूजा करने की परंपरा है। चूंकिरावण की जान उसकी नाभि में बसती थी, अतः यहाँ पर रावण की नाभि परतेल लगाने की परंपरा है अन्यथा पूजा अधूरी मानी जाती है।


भारत में यूँ तो कई जगह दशहरे का पर्व अलग अंदाज में मनाया जाता है परंतुहिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा एवं मैसूर का दशहरा अपनी अलगपहचान से जाना जाता है।

कुल्लू का दशहरा एक दिन का नहीं बल्कि सात दिन का त्योहार है। जब देश मेंलोग दशहरा मना चुके होते हैं तब कुल्लू का दशहरा शुरू होता है। यहाँ इसत्योहार को दशमी कहते हैं। हिन्दी कैलेंडर के अनुसार आश्विन महीने कीदसवीं तारीख को इसकी शुरुआत होती है। इसकी एक और खासियत यह हैकि जब सब जगह रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण का पुतला जलाया जाता हैतब कुल्लू में काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के नाश के प्रतीक के तौरपर पाँच जानवरों की बलि दी जाती है।


मैसूर के दशहरे का इतिहास मैसूर नगर के इतिहास से जुड़ा है जोमध्यकालीन दक्षिण भारत के अद्वितीय विजयनगर साम्राज्य के समय सेशुरू होता है। हरिहर और बुक्का नाम के दो भाइयों द्वारा चौदहवीं शताब्दी मेंस्थापित इस साम्राज्य में नवरात्रि उत्सव मनाया जाता था। लगभग छहशताब्दी पुराने इस पर्व को वाडेयार राजवंश के लोकप्रिय शासक कृष्णराजवाडेयार ने दशहरे का नाम दिया। समय के साथ इस उत्सव की लोकप्रियताइतनी बढ़ गई है कि वर्ष २००८ में कर्नाटक सरकार ने इसे राज्योत्सव (नादहब्बा) का स्तर दे दिया है।

यदि हम अलग-अलग स्थान पर प्रचलित राम कथाओं को जानें, तो रावण कोबुरा व्यक्ति नहीं कहा जा सकता है। जैन धर्म के कुछ ग्रंथों में रावण को'प्रतिनारायण' कहा गया है। रावण समाज सुधारक और प्रकांड पंडित था।तमिल रामायणकार 'कंब' ने उसे सद्चरित्र कहा है। वह राक्षस कुल का होतेहुए भी भगवान शंकर का उपासक था। उसने लंका में छह करोड़ से भी अधिकशिवलिंगों की स्थापना करवाई थी।



युग बदल चुका है। तब त्रेतायुग था, आज कलयुग है। रावण असुर था, उसकीवृत्तियाँ भी असुरी थीं लेकिन उसने भी अपने जमीर से गिरकर कोई कार्य नहींकिया। आज का मानव तो दानव नहीं है लेकिन उसकी असुरी वृत्तियाँ रावणको भी शर्मसार कर रही हैं। नित नई अमानवीय घटनायें एवं एक से बढकरएक घोटले असुरों को भी पीछे छोङ चुके हैं। आज तो ऐसे महानुभावों काप्रादुर्भाव हो रहा है जो जानवरों का चारा हो या विकलांगो सहारा, सभी कोहजम करने की क्षमता रखते हैं। कहते हैं कि दशहरा का पर्व दस प्रकार केपापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरीके परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
 
 
आज पापों की काली छाया भारत की धरती पर गहराती जा रही है। मानवमन-दूषित होता जा रहा है। स्वार्थ-लोलुपता की आँधी में परमार्थ का लक्ष्यकहिं गुम हो रहा है। अहंकार असंख्य विकार लेकर लोगों के दिलों में दस्तक देरहा है। आचरण की मर्यादा अपना अस्तित्व खोती नजर आ रही है।मित्रो, मनमें ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि, आज के परिपेक्ष में लगभग हर दिन एकसे बढकर एक हो रहे घोटाले रूपी पापों को परित्याग करने की प्रेरणा प्रदानकरने वाला दशहरा कब आयेगा?
 
 
रावण को हर साल, पुरानी परंपरा के अंर्तगत जलाकर, दानवता पर मानवताकी विजय के रूप में हम सब मनाते हैं। असुरी प्रवृत्ति के सर्वनाश कासंदेशवाहक पर्व दशहरा युगों-युगों से इसीलिए मनाया जाता है ताकि मनुष्यके अंतर्मन में तामसी प्रवृत्तियाँ समाहित न हो सकें। परंतु उस असुरीप्रवृतिको कब जलायेंगे जो पूरे समाज को जला रही है?
 
काश हर सालदशहरे पर हम प्रतीकात्मक रूप की बजाय वास्तव में अपने औरसमाज के अन्दर फैले रावण को ख़त्म कर पाते !!
 
 

मित्रों, विजयादशमी के इस पावन पर्व पर हम सभी मानवता को सशक्त करनेका प्रयास करें एवं अपने कर्मों, में आदर्श और मर्यादाएँ लाकर असत्य परसत्य की विजय का शंखनाद करें।

                                   

विजयदशमी की आप सभी को हार्दिक बधाई

Everyday sun rise to give us a message
that darkness will always be beaten by light.
Let us follow the same natural rule
and enjoy the festival of the victory of good over the evil.
     Happy Dussehra!